Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
शून्य एव हि वेताल इवेत्थं चित्तवासना ।
उदितेयं जगन्नाम्नी तच्छान्तौ शान्तिरक्षता ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार शून्य में ही वेताल की नाई यह चित्तवासना उत्पन्न हुई है, जिसका नाम जगत् है।
उसकी शांति हो जाने पर अक्षत शांति ही अवशिष्ट रहती है