Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
जीवं विवेकिनमिहोपदिशन्ति तज्ज्ञा नो बालमुद्भ्रममसन्मयमार्यमुक्तम् ।
अज्ञं प्रशास्ति किल यः कनकावदातां स स्वप्नदृष्टपुरुषाय सुतां ददाति ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह क्यों उपदेश के योग्य नहीं है ? इस पर कहते हैं।
इस जगत् में आत्मज्ञानी लोग विशिष्ट अधिकारप्राप्त जीव को ही उपदेश दिया करते हैं, न कि
उस लड़के को, जो अधिकार प्राप्त न होने से अनेक प्रकार की भ्रान्तियों से ग्रस्त है, आर्यो द्वारा
उपेक्षित है एवं असद्रूप देह आदि में अभिमान रखने के कारण असन्मय है । जो पुरुष ऐसे अनधिकारी
अज्ञानी जीव को उपदेश देता है, वह मानों सोने-सी सुन्दरी कन्या स्वप्न में देखे गये पुरुष को देता है।
वह भी एक बहुत बड़ा मूर्ख ही है, यह भाव है