Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
स्वयं च सदसद्रूपा लीयन्ते स्वप्नशैलवत् ।
सर्गैर्न देश आक्रान्तो न च कालो न कर्तृता ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्ग ब्रह्मसत्ता से निरपेक्ष होकर अपनी सत्ता से ही या देश-कालसम्बन्ध के बल से प्राप्तसत्ता से
ही रहें ? इस शंका पर कहते हैं।
ये सर्ग स्वप्नकालीन पर्वत की नाई सद्रूप और असद्रूप होकर विलीन हो जाते हैं। इसी प्रकार देश
और काल भी सर्गो से पहले आक्रान्त नहीं थे और न सर्गो की कर्तृता ही थी