Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतदुक्तं परं तेन स्वयमेव च वेद्म्यहम् । राम त्वमपि जानीषे यथेदं समवस्थितम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वसाक्षात्कार में पर्यवसित, इश्वर द्वारा उपदिष्ट, स्वात्मरूप शिवजी के पूजन की श्रीरामजी को श्रद्धाधिक्य होने के लिए प्रशंसा कर रहे वस्रिष्ठजी स्वयं उसका पुनः उपदेश देते है । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, महादेव शंकरजी ने सर्वोत्कृष्ट यह स्वात्मशिवार्चनरूप पूजन मुझसे कहा ओर स्वयं मैं भी उसे जानता हँ । जिस तरह का यह जगत्‌ का स्वरूप अवस्थित है उसे आप भी जानते ही हें

सर्ग सन्दर्भ

बयालीसवाँ सर्ग समाप्त तैंतालीसवाँ सर्ग वैराग्य से पूर्ण स्वात्मस्वरूप शिवजी का पूजन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी प्रबुद्ध हो गये ओर स्वयं कृतकृत्य होकर शिवार्चन में तत्पर हो गये यह वर्णन ।