Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
आत्मज्ञानाचलस्याग्रे राम विश्रान्तवानसि ।
अहंभावमहाश्वभ्रे न पुनः पातमर्हसि ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, आपने आत्मज्ञानरूपी पर्वत की चोटी पर विश्राम कर लिया है, अतः अहंभावरूपी
महागर्त में फिर गिरने योग्य नहीं हैं