Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 45, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
स्वसंनिवेशवैचित्र्यमन्यत्वफलतां गताम् ।
अत्यजन्त्या तया तन्व्या स्थूलयाप्यतिबालया ॥ १६ ॥
इयमस्मीति कलनादसदप्यन्यतामलम् ।
भेदाद्यसंभवदिदं स्वयमुत्पाद्य भावितम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्यत्व का (अद्भयता का) ही उपपादन करने के लिए चमत्कृतिपद का स्वारस्य प्रकट करते हैं।
(चूँकि) सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, महान् से भी महान्, पुराना होने पर भी वृद्धि आदि-विकारों के न
होने से अत्यंत बालस्वरूप तथा अपने में अध्यस्त भेदमात्र की फलरूपता में पर्यवसित एकमात्र
चैतन्यात्मक रस के सारभूत पारमार्थिक स्वकीय सन्निवेश (रचना) वैचित्र्य का त्याग न करती हुई
उस स्वात्मचमत्कृति ने “यह देहादि मैं हूँ” इस प्रकार की कल्पना के द्वारा (५) असत् ओर अन्यता
की आपादक अविद्यारूप मल का ()) इस तरह के असंभावित भूत, भुवन आदि भेदो के रूप से
स्वयं ही उत्पादन कर केवल भावना कर रक्खी है, वास्तव में भावनानाम की कोई वस्तु ही नहीं हे ।
(अतः यह अद्वितीय (अनन्य) ही है, यह भाव हे ।)