Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 45, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
संविच्छक्तया तया तत्र ततस्तरलरूपया ।
निज एव समे रूपे दृगित्थं संप्रसारिता ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, व्यवहार
समर्थ स्वरूपता प्राप्त करने के अनन्तर चंचल स्वरूपवाली उस चितिशक्ति ने अपने निर्विकार रूप में
ही इस तरह की जगदाकार दृष्टि फैलाई हे