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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 45, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 45, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

न कदाचन पाकेन पातं तेन समेति यत् । सदैव पक्वमप्यङ्ग जरसा यन्न बाध्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

वैसे रस से परिपूर्ण होने पर भी पाक से वह कभी गिरता नहीं । (तव क्या वह अपने स्थान में ही जीर्ण हो जाता है ? इस पर नहीं” ऐसा कहते हैं।) भद्र, सर्वदा ही पके हुए भी उस विल्वफल को जीर्णता बाधा नहीं पहुँचाती