Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमेतद्विजानासि दृष्टवानसि तां शिलाम् ।
यो यश्च तत्र वै प्राणः समस्तादृगनन्तरः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक का सम्बन्ध आपने भलीभाँति जान लिया है, यों अनुमोदन कर रहे
महर्षि वस्रिष्ठजी कहते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, मैंने जिस शिला का दृष्टान्त दिया है, वह मैंने देखी है, इस
प्रकार आप जो स्मरण कर रहे हैं, वह ठीक ही है, ओर दार्ष्टान्तिक चिदात्मा जिस स्वभाव का है यानी
जैसा छिद्रशून्य चिद्घन, सम, प्राण का भी प्राण-निरतिशयानन्दस्वरूप -है, उसके विषय में भी जो
आपने देखा है, उसका भी आप स्मरण करते हैं