Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
शङ्खपद्मादिकं लोकं पाषाणे लिख्यते यथा ।
भूतं भवद्भविष्यच्च शिलायां शालभञ्जिका ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
तेषां च निकटे सन्ति यह जो ऊपर कहा गया है, उसका अब तात्पर्य बतलाते हैं।
श्रीरामजी, जैसे पत्थर में चित्रकार की मनःकल्पना से शंख, कमल आदि चित्र निर्मित किये जाते
हैं, वैसे ही एकमात्र मन की कल्पना से इस चितिरूप शिला मे, भूत, वर्तमान और भविष्यत्-सब प्रपंच
चित्रित किया गया हे । प्राकृत शिला में जैसे शालभंजिका (पुतली) आदि वास्तव-से प्रतीत होते हैं, पर
वास्तव नहीं हैं, किंतु शिलारूप ही हैं; वैसे ही चिति-शिला में उक्त सभी संस्थान वास्तव -से प्रतीत
होने पर भी वास्तव नहीं हैं, किंतु चितिरूप ही हैं