Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
तथा सर्गश्चितो रूपादभिन्नोऽपि वपुर्मयः ।
सुषुप्तावस्थया चक्रपद्मलेखाः शिलोदरे ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार पाषाण-शिला के भीतर
शिल्पी द्वारा लिखित कमल, उस शिलाकोश से अभिन्न होने पर भी अपने परिच्छिन्न आकार से युक्त
होकर उससे भिन्न-सा भासता है, उसी प्रकार चिति के स्वरूप से अभिन्न होने पर भी यह सर्ग (सृष्टि)
उससे अन्य परिच्छिन्न आकारवाला होकर उससे भिन्न-सा भासता है, वास्तव में भिन्न नहीं है ॥ २ २॥
जैसे टाँकी से (पत्थर काटने की छेनी से) छेदन करने के पूर्व शिला के भीतर चक्र, पद्म आदि की
पंक्तियाँ अनभिव्यक्त अवस्था से अवस्थित रहती हैं, वैसे ही मन की कल्पना से पूर्व इस चितिशिला के
भीतर ये जगत्रूपी पंक्तियाँ अनभिव्यक्त (अव्याकृत) अवस्था से अवस्थित हैं