Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अत्रान्यार्थमिदं विद्धि मृगतृष्णाम्भसा समम् ।
बीजं पुष्पफलान्तस्थं बीजान्तर्नान्यदात्मकम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
फूल से लेकर फलपर्यन्त अपने कार्यो में बीज की अनुवृत्ति दिखलाई पड़ने के कारण जैसे फूल
आदि बीजरूप ही होते है वैसे ही सभी जगह चितिसत्ता की अनुवृत्ति दिखलाई पड़ने के कारण सब
चितिस्वरूप ही हैं, यह कहते हैं।
फूल से लेकर फल तक अपने कार्यों में बीज अनुस्यूतरूप से रहता है, अतः बीज के भीतर फूल,
फल आदि बीज को छोड़कर दूसरा कुछ भी नहीं है; क्योकि अंकुर आदि पूर्व पूर्व विकारों में जो
बीजशक्ति विद्यमान रहती है, वही उसके बाद उत्तर-काल में काण्ड, शाखा, पल्लव आदि रूपों में
परिणत हो जाती है