Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
भूरिभावविकाराढ्यो योऽयं जगदुरुभ्रमः ।
सुषुप्तमेव तद्विद्धि शिलान्तः पङ्कजादिवत् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रभूत भावविकारों से परिपूर्णं जो यह जगद्रूप महान् भ्रम
है, उसे उस प्रकार अनुन्मिषित वासनामात्र ही जानिये, जिस प्रकार शिला के भीतर कमल आदि