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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

समुद्रकोटरावर्तपयःस्पन्दविलासवत् । अनानैव च नाना चिच्छिलान्तःसंनिवेशवत् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा, समुद्र के भीतर स्थित आवर्त (मँवर), तरंग आदि स्पन्द-भेद जैसे समुद्ररूप ही हैं, वैसे ही चिति के भीतर स्थित जगत्‌ आदि भेद एकमात्र चितिरूप ही हैं, यों तात्पर्य जानना चाहिए, यह कहते हैं । समुद्र के गर्भ में स्थित आवर्त, तरंग आदिरूप जलस्पन्दन के विलास की नाई ओर शिला के भीतर खोदे गये कमल की नाई अद्वितीय ही यह चिति जगद्रूप से नाना भासती है । तात्पर्य यह है कि वह जगदादि भेद चितिरूप ही है