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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

देशकालक्रियादीनामपि तन्मयरूपतः । इदमन्यदिदं चान्यदिति नात्रोपपद्यते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

तब क्या चिति-तत्त्व से अन्य ही सर्ग है ? इस पर यह भी नहीं कहा जा सकता, यह कहते है। चूँकि देश, काल क्रिया आदि भी अपने अधिष्ठानभूत चैतन्यमात्रस्वरूप ही हैं, अत: "यह अन्य है", “यह अन्य है" इस प्रकार की कल्पना यहाँ नहीं की जा सकती