Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 47, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 47, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
पिच्छपक्षौघकाठिन्यं मयूराण्डरसे यथा ।
चिति तत्त्वेऽस्ति नानाता तदभिव्यञ्जनात्मनि ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार मोर के अण्डे के रस में चित्र-विचित्र पंखों का समूह भासता है, उसी प्रकार
जगत् के अभिव्यंजनस्वरूप चिति-तत्त्व में भी नानारूपता भासती है