Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
न देशकालवस्त्वादि तदेवास्ति न चेतरत् ।
एतैः सर्वैर्विनिर्मुक्तं हृदि कोशशतेन च ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
उपर्युक्त देह आदि
समस्त पदार्थो से ब्रह्म विनिर्मुक्त है ओर अनन्त भूत एवं भावी देह-कोशों से युक्त चित्त में जिसके
रहने पर यह दश्य जगत् आविर्भाव, तिरोभाव आदिरूप से स्पन्दित होता है, वह सन्मात्रस्वरूप
आत्मपद (ब्रह्म) ही है, दूसरा नहीं, यह संभावित हे