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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

यत्र नाभ्युदितं किंचित्तत्र सर्वं च विद्यते । तदत्राप्यङ्गिराः स्वर्गसुखसारेण बिम्बति ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

विचित्र भोगों के आकार से), स्फटिक, दर्पण आदि में चन्द्रबिम्ब की नाईं, निरतिशय आनन्द के अस्तित्व का अनुमान कर लेना चाहिए