Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 48, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 48, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
एते ये स्तब्धनयनदृष्टयो निर्निमेषिणः ।
ते दृश्यदर्शनासङ्गस्पन्दत्यागे व्यवस्थिताः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
तब सभी लोग क्यो उसका अनुभव नहीं करते ? यदि ऐसी शंका हो तो उसका समाधान यह है कि
दृश्य और दर्शन के (इन्द्र्यो के) सम्बन्ध से तथा प्राणस्पन्दन से जनित विक्षेप होने से उसका अनुभव
नहीं करते। अतएव उन दोनों प्रतिबन्धको का परिहार करने के लिए योगी लोग नासिका के अग्रभाग में
निरुद्ध दृष्टि तथा प्राणनिरोध में तत्पर दिखाई देते हैं, यह कहते हैं।
निमेषरहित वे योगीजन, जिनके नेत्रगोलक तथा तद्गत इन्द्रियाँ स्थिर हैं, दृश्य एवं दृष्टि के
सम्बन्धत्यागप्रयुक्त स्पन्द-त्याग के लिए सन्नद्ध हैं