Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
त्वमहं जगदाशाश्च द्यौर्भूश्चाप्यनलादि वा ।
ब्रह्ममात्रमनाद्यन्तं नाविद्यास्ति मनागपि ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, आप और मैं, यह संसार और दिशाएँ, आकाश और पृथ्वी अथवा अग्नि
आदि (जो कुछ भी आप देख रहे हैं, वे) सबके सब आदि ओर अंत से शून्य केवल ब्रह्ममात्र है, अविद्या
तो तनिक भी नहीं है