Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 5, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अहो अहं गतश्चित्त्वं भवद्वाक्यार्थभावनात् ।
शान्तं जगज्जालमिदमग्रस्थमपि नाथ मे ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, आपके द्वारा उपदिष्ट वाक्यों के अनुसन्धान से मैने चैतन्यरूपता
(चिदेकरसपूर्ण आत्मरूपता) प्राप्त कर ली, यह जगत -रूपी जाल सामने रहते भी विलीन हो गया
सर्ग सन्दर्भ
चौथा सर्ग समाप्त 4 च पॉँचवाँ सर्ग मोक्षात्मक उत्तम सुख में विश्रान्ति प्राप्त कर लेनेवाले प्रबुद्ध श्रीरामचन्द्रजी का गुरु महाराज के सामने सविस्तार अपने अनुभव का वर्णन ।