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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

अच्छस्य नयनस्याथो रश्मयो जीववेष्टिताः । क्रोडीकुर्वन्त्यलं दृश्यं जीवस्तत्त्वेन विन्दति ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

दूरस्थ विषयों का इन्द्रिययोलकों के साथ सम्बन्ध कैसे होता है ? इस प्रकार की पामर शंका का निरास कर रहे महाराज वलिष्टजी कहते हैं। पूर्वोक्त रीति से जीवचैतन्य के साथ सम्बद्ध हो रही गोलक से भिन्न, स्वच्छतम चक्षुरिन्द्रिय की रश्मियाँ पुरोवर्ती दृश्य घटादि विषयों का पूर्णरूप से आलिगंन कर लेती हैं, और तदनन्तर जीव उन्हें तत्त्वतः जान लेता है