Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
शब्दस्त्वाकाशनिष्ठत्वात्कर्णाकाशगतः क्षणात् ।
जीवाकाशं विशत्यन्तरित्थमिन्द्रियसंविदः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रोत्र द्वारा भीतर जीवाकाश में प्रवेश हो जाता है। (इसी रीति से गन्ध का भी पवन के द्वारा अन्तःप्वेश
कर्थंचित माना जा सकता है, इस आशय से यथासंभव उक्त न्याय का उपसंहार करते है ।) इसी रीति
के अनुसार इन्द्रियों से विषयों का परिज्ञान होता है