Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यत्रोद्यदाचारमपि सदप्यसदिव स्थितम् ।
जगज्जान्विषयांस्त्यक्त्वा काये त्वं तिष्ठ निर्मले ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, निष्पन्न होनेवाले व्यवहारो के लिए क्रियाश्रय होने के कारण व्यावहारिक
सत्यभूत भी पदार्थ जहाँ शून्य की नाई स्थित हैं, उस निर्मल सत्यस्वरूप ब्रह्मपद में जगत् में उत्पन्न
विषयों को छोडकर आप जीवन्मुक्त होकर स्थित रहिए