Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अद्याङ्कुरोऽहमद्यार्करुगहं त्वद्य वारिदः ।
यथेति तिष्ठत्यम्भोदस्तथात्मा सदसद्वपुः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मेघ कालभेद से - पहले ग्रीष्म-ऋतु
में 'मैं सूर्यतापरूप हूँ” यों अभेदभावना कर सूर्यतापरूप से, फिर वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में वृष्टि करने के
समय मे जल बरसानेवाला हूँ” यों जलप्रदरूप से ओर फिर पृथ्वी में प्रवेश द्वारा अंकुर के अन्दर
जलरूप से उसका प्रवेश होने पर “मैं अंकुररूप हूँ” यों अंकुररूप से स्थित रहता है; वैसे ही यह आत्मा
भी कालभेद से भाव और अभाव का आकार होकर स्थित रहता हे