Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
प्रतिभासो यथा स्वप्ने नरः कुड्यं पटो भवेत् ।
भवत्यसत्यमेवेदं देहान्तरमिदं स्वतः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में दिखाई दे रहा मनुष्य शीघ्र ही दीवार बनकर पट
बन जाता है, वैसे ही मरण-मूर्च्छा मे भी प्रतिभासमान असत्यरूप ही यही शरीर वह दूसरा शरीर
अपने-आप बन जाता हे