Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
कालेनैतादृशं रूपमिदं नान्यत्वमेति वै ।
प्रकृतं निश्चयारूढं भ्रमन्त्येते भवः स्वतः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या युवावस्था और वृद्धावस्था की नाई देहान्तर-प्राप्ति भी इस देह का कालिक परिणाम ही
है 2 इस शका पर नहीं ऐसा कहते हैं।
देह का यह वर्तमान स्वरूप समय पाकर युवावस्था के सदृश देहान्तररूप हो जाता है ऐसी बात नहीं
है, क्योकि वर्तमान शरीर बाल्य, यौवन आदि अवस्थाओं के भिन्न होने पर भी "वह यही शरीर है" इस
प्रत्यभिज्ञात्मक निश्चय का विषय होता है। परंतु ये भूत एवं भविष्यत् शरीर तो वैसी प्रत्यभिज्ञा के विषय
नहीं हैं, उक्त प्रत्यभिज्ञा के न होने से दूसरों द्वारा "कालतः अन्य हैं ओर वस्तुतः अन्य नहीं है" इत्यादि
भ्रान्ति को प्राप्त होते हे । अतः उनकी जीव से ही उत्पत्ति है यानी वासना से ही उनका उद्भव है