Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
स्थावराद्यास्ववस्थासु कल्पवृक्षदशासु च ।
भवत्येव सुषुप्तस्थो घनमोहशिलाघनः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
उन स्थावर आदि निकृष्ट योनियों में जड़ता के आधिक्य से सुषुप्ति की प्रचुरता है, यह कहते हैं।
स्थावर आदि अवस्थाओं में तथा कल्पवृक्ष की अवस्थाओं में भी (&) पाषाण-शिला के समान
घनीभूत जडतावाली (तमोयुक्त) यह आतिवाहिक देह सुषुप्ति-अवस्था में ही स्थित रहती हे