Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
जीवाणूनां तथैवान्तर्मिथ्यासंसरणोदयः ।
बन्धोस्य वासनाबन्धो मोक्षः स्याद्वासनालयः ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, वासनाओं का बन्ध ही
इस जीवाणु का बन्ध है, वासनाओं का नाश ही इसका मोक्ष है और वासनाओं का अन्त यानी अवधि ही
इसकी सुषुप्ति अवस्था है, (क्योंकि तुर्य और तुर्यातीत ये दोनों पद वासनाशून्य होते हैं।) ओर वह
स्वप्न में चित्र-विचित्र रूप से स्फुरित होती है