Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चेत्यादिबुद्ध्या तत्किंचिन्न मनस्तां च गच्छति ।
न च जीवत्वमायाति न च पुर्यष्टकात्मिका ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शका हो कि धिति ही मन आविरूप हो जाती है“ ऐसा जब आप कह चुके हैँ तव मन आदि की
असत्यता में चिति ही असत्य क्यो नहीं हो जाती 2 तो इस पर कहते है।
श्रीरामजी, "चिति मन आदिरूप हो जाती है" इत्यादि जो कुछ कहा गया है वह केवल चिन्तनीय,
मननीय आदि वस्तुविषयक बुद्धिवृत्ति के अध्यारोप से ही कहा गया है; इसलिए चिति परमार्थतः
मनोरूपता को प्राप्त कभी नहीं होती इसी तरह वह न तो जीवरूपता को प्राप्त होती हे ओर न
पुर्यष्टकरूपता से ही युक्त होती हे