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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 51, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 51, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

तस्मात्संपद्यते जीवश्चिन्मूर्तिर्मननात्मकः । भ्रमः केवलमित्याद्य उपदेशाय गीयते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि वह परमात्मा अद्वितीय ही है तो (तस्मात्‌ सर्व एव आत्मानो व्युवच्चरन्ति” (उसी परमात्मा से सभी जीवात्मा निकलते हैं) इस श्रुति से अग्नि-विस्फुलिंग' न्यायानुसार जीवसम्पत्ति कैसे कही ग्ड? इस शंका पर शिष्यों को समझाने के लिए कल्पना से वैसी कही गयी है, यह कहते हैं। “उस परमात्मा से चैतन्यस्वरूप जीव उत्पन्न होता है 'इत्यादि मननात्मक कल्पना एकमात्र शिष्यों को समझाने के लिए ही कही गई हे