Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 52, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यो जीवस्यादितः स्वप्नो नानाकलनकोमलः । तमिमं विद्धि संसारं न सत्यं नाप्यसन्मयम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सभी जीवो में प्रत्येक का स्वप्न अलग-अलग होता है, परंतु जाग्रत्‌-प्रपंच तो सबके लिए एक-सा ही है और स्वप्नरूप कैसे हो सकता है ? इस पर कहते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, सम्पूर्णं जीवसमष्टिस्वरूप हिरण्यगर्भ का अनेकविध कल्पनाओं से कोमल (रमणीय) जो प्रथम स्वप्न है, वही हम लोगों का “जाग्रत्‌ संसार" हे, यह आप जानिए । वह संसार न सत्यरूप है और न असत्यरूप ही है

सर्ग सन्दर्भ

इक्यावनर्वँ सर्ग समाप्त बावनवाँ सर्ग आदि जीव हिरण्यगर्भ का स्वप्न ही जगत्‌ है, उसमें अनासक्ति से उसका विनाश हो जाता है इस अर्थ का दृढ़ीकरण करने के लिए महाराज वसिष्ठजी द्वारा अर्जुनाख्यान का उपक्रम |