Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 52, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
अनन्तस्यैकरूपस्य सतः सूक्ष्मस्य खादपि ।
आत्मनः परमेशस्य किं कथं केन नश्यति ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
अनन्त, एकरूप, सदात्मक और आकाश से भी अत्यन्त
सूक्ष्म परब्रह्म परमात्मा का किससे किस तरह क्या नष्ट होता है ?