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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 52, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 52, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

सर्वगत्वादनन्तत्वात्स्वस्य जीवस्य जीवतः । यद्भावयन्ति चेतन्ति तदेवाश्विति सत्यवत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

कल्पित भेदो में सत्यता के आरोप में कारण बतलाते हैं। स्वयं व्यष्टिरूप होने के कारण ही समष्टि-जीव की अपेक्षा भी अत्यंत जीवभूत ये -परमार्थतः सर्वगामी ओर अनन्त, अतएव परिच्छेदशन्य-सत्यस्वरूप होने के कारण जिस -जिस की भावना करते हैं; उसीको - उसमें आसक्ति होने से अपनी सत्ता के आरोप द्वारा-शीघ्र ही सत्य-सा समझ लेते हैं