Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
मूर्खस्यापि स्वकर्मैव श्रेयसे किमु सन्मतेः ।
मतिर्गलदहंकारा पतितापि न लिप्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जब अज्ञानी का भी स्वधर्म श्रेय के लिए है, तब तत्त्वज्ञानी को स्वधर्म से नरकादि-प्रसक्तितो
किसी तरह हो ही नहीं सकती; पतन को उत्पन्न करनेवाले करोड़ों भी महापातक अहकाररहित पुरुष
की बुद्धि को लिप्त नहीं कर सकते इस आशय से कहते हैं।
(53) इस विषय में कहा भी गया है कि समुदाय से जनित दुःख के लिए समुदायवर्ती किसी एक
को शोच करना ठीक नहीं होता - “न सामवायिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति"।
जब मूर्ख का भी अपना कर्म श्रेय के ही लिए है तब बुद्धिमान् के स्वकर्म के लिए तो कहना ही क्या ?
अहंकार से निर्मुक्त बुद्धिमान् की बुद्धि तो पतित होने पर भी महापातकं से लिप्त नहीं होती