Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
अपृथग्भूत एवैष पृथग्भूत इव स्थितः ।
पृथक्त्वं हि न पर्यन्तो नाहमित्यवगच्छति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
“मैं ' इस प्रकार का यह अहंभाव अपने अधिष्ठानस्वरूप ब्रह्म से वास्तव में भिन्न है ही नहीं, केवल
अज्ञान से उससे भिन्न-सा स्थित जान पड़ता है; क्योकि पृथकृत्व का नाम है परिच्छेद, और वह ब्रह्म
में है नहीं। और “असद्रूप" मे नहीं हूँ,” यों सब कोई जानता है। ऐसी स्थिति में अवगन्ता होने से पृथकृत्व
की उपपत्ति और पृथकृत्व होने से अवगन्ता की उपपत्ति-इन दोनों में किसी एक के त्याग में उपपत्तिरहित
पृथकृत्व का ही अवश्य त्याग कर देना चाहिए, यह भाव है