Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
कालोऽहमहमद्वैतं द्वैतं चाहमहं जगत् ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यों दो रूपोंवाले मुझमें अधिकार के तारतम्य से अपना मन लगाकर स्थित रहो, तादृश
स्वरूपवाले मुझमें वैसे ही भक्त होओ यानी श्रवण, कीर्तन आदि नव प्रकार की भक्ति से युक्त
होओ, ज्ञानयज्ञ से या कर्मयज्ञ से तादृशस्वरूप मेरे यजनशील होओ, उक्तस्वरूप मुझे नमस्कार
करो और मेरी शरण में रहो । कहे गये दोनों प्रकारों से भी मुझमें चित्त लगाकर साक्षात् या परम्परया
स्वात्मभूत मुझको ही प्राप्त करोगे