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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

एकत्वं सर्वशब्दार्थ एकशब्दार्थ आत्मनः । आत्मापि च न सन्नासद्गतो यस्याशु तस्य तत् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वयं ही "सर्वभूतस्थमात्मानम्‌ इस श्लोक के तात्पर्य का वर्णन करते है । हे अर्जुन, सर्वशब्द का अर्थ हे एकत्व ओर वह एकशब्दार्थ आत्मा का (स्वभाव है) । वह आत्मा भी “न सत्‌ है और न असत्‌ हे" यों जिस किसीको जब अनुभूत होता है तब शीघ्र ही उसे केवल्य प्राप्त हो जाता है । तात्पर्य यह है कि जब सब भूतों में अधिष्ठानरूप से स्थित आत्मा को देखता है तब वह सर्वशब्द के अर्थ-अधिष्ठानस्वरूप से अतिरिक्त दूसरेका लाभ न होने से एकत्व ही होता है। वह एक शब्दार्थ प्रत्यगात्मा के स्वभाव में पर्यवसित होता है। वह आत्मा भी न सत्‌ है यानी न तीन मूर्तभूतों के स्वभाववाला है और न असत्‌ है यानी न अवशिष्ट दो सूक्ष्मभूतों के स्वभाववाला है, किंतु भूमानंद चिदेकरस स्वभाव ही है। उस प्रकार के स्वभाव से युक्त आत्मा जिसके अनुभवपथ में आता है, उसे तत्क्षण ही यानी उस प्रकार की ज्ञानोत्पत्ति के अव्यवहित उत्तरक्षण में ही जन्म आदि विकारों से रहित, भूमानंदस्वरूप कैवल्य प्राप्त हो जाता है