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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 53, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

(॥70) निरहंकारी पुरुष का फल की अभिलाषा से रहित, कायिक, वाचिक और मानसिक कर्म चित्तशुद्धि द्वारा ज्ञान का उद्दीपक होने से परमपुरुषार्थ के लिए ही होता है। इसलिए हे अर्जुन, तुम्हें स्वधर्मस्वरूप युद्ध से दुःखप्रसक्ति नहीं है, यह कहते हैं। योगी लोग (आरुरुक्षु या मुमुक्षु लोग) देह से, मन से, बुद्धि से और केवल इन्द्रियों से भी फल की अभिलाषा का त्यागकर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैँ