Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 54, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
परं तत्त्वज्ञमाश्रित्य निरासक्तेर्महात्मनः ।
सर्वकर्मरतस्यापि कर्तृतोदेति न क्वचित् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञान से प्रमाद नष्ट हो जाने पर तो आसक्ति नहीं टिकती, अतः आसक्तिराहित उस पुरुष में
अकर्तृत्व स्वतः ही सिद्ध हो जाता है, यह कहते है ।
परम तत्त्वज्ञान का आश्रय लेकर आसक्तिरहित हुए, सब कर्मो में तत्पर भी महात्मा में कभी भी
कर्तृत्व उदित नहीं होता