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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच । भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । एतत्तन्मात्रजालात्मा जीवो देहेषु तिष्ठति ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

“एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति“ इस श्रुति का तात्पर्य लेकर भगवान्‌ समाधान करते हैं। श्रीभगवान ने कहा : हे अर्जुन, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन और बुद्धि इनसे युक्त तन्मात्राओं का जो समूह है, तत्स्वरूप हुआ ही जीव देहों में स्थित रहता है। भाव यह है कि पाँच भूतमात्राओं से निर्मित, मन, बुद्धि आदि से घटित व्यष्टिसमष्टिरूप स्थूल-सूक्ष्मभूत देहों में जो तादात्म्यापत्ति है, वही उस परमात्मा का जीवभाव है और वही जन्म-मरण एवं सुख-दुःखादिरूप भ्रम की स्थिति में निमित्त है