Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
नरकस्वर्गसर्गादिवासनावशतोऽभितः ।
प्रपश्यति चिराभ्यस्तं जीवो जरठमोहधीः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
शास्त्रीय प्रयत्नो के मन्द हो जाने पर पूर्ववासना ओके वैचित्र्य से सुखदुःखात्मक अनर्थोकी परम्परा
किसी तरह रोकी नहीं जा सकती, इस आशय से कहते हैं।
अनादि अविद्या से मूढ़-बुद्धि यह जीव वासनावश अपने चारों ओर नरक, स्वर्ग, सृष्टि आदि
देखता रहता है जो कि उसे चिरकाल से अभ्यस्त हैँ