Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 56, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
न मनागपि भेदोऽस्ति स्फुटमप्युपलब्धयोः ।
इमा या उपलक्ष्यन्ते भित्तयश्चित्तचित्रजाः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
और भी आश्चर्य दिखलाते हैं।
(प्रसिद्ध चित्रस्थलों में चित्रों की आधारभूत दीवारें उन चित्रों से भिन्न होती हैं, परन्तु) ये जो
चित्तरूप चित्रकार द्वारा उत्पन्न अज्ञानाकाशरूप दीवारें प्रतीत हो रही हैं, उनमें और चित्रों में आधार-
आधेयरूप भेद स्पष्टतः प्रतीत होने पर भी परमार्थतः उनकी चित्तस्वरूपता होने के कारण परस्पर
किंचित् भी भेद नहीं है (अहो ! यह भी एक दूसरा आश्चर्य है।)