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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 56, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

आत्मा जगत्तथैवेदं सबाह्याभ्यन्तरं नभः । चिरंतनमनोराज्यं यत्तस्मात्किल सत्यता ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मा, मन और उसका कार्य बाह्य ओर आभ्यन्तर यह सब जगत्‌ स्वप्न की तरह शून्य है (असत्‌ ही है) । तब मनुष्यों को इसमें सत्यत्व की प्रतीति कैसे होती है इस पर कहते हैं। चूँकि यह सब चिरकालिक मनोराज्य है यानी इसकी दीर्घकालतक अनुवृत्ति होती है, इसलिए लोगों को इसमें सत्यत्व की प्रतीति होती है