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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verses 31–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 56, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

नानाग्रहोग्रकचनं नानाकाराग्रपश्चिमम् । व्योमनीलसरः फुल्लताराचन्द्रार्कपङ्कजम् ॥ ३१ ॥ विचित्ररचनोद्युक्तमेघालीपत्रमञ्जरि । प्रकोष्ठकामिलिखितसुरासुरनृपुत्रिकम् । परमालोकमङ्कोलयुवताकाशकुडयकम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर चित्रपद्मवन आदि का वर्णन करते है । इसमें आकाशरूप नील सरोवर मे खिले हुए तारे, चन्द्र एवं सूर्यरूप कमल हैं । इस जगद्रूप चित्र में शरद्‌ आदि कालभेदं द्वारा विचित्र रचनाओं से ऊपर सुशोभित मेघपंक्तिरूप पत्ते ओर मंजरियाँ लगी हुई है । इसके त्रिभुवानात्मक प्रकोष्ठों में (चित्रकोष्ठ-भेदो में चारो ओर देव, असुर, मनुष्य आदिरूप पुतलियाँ लिखी गयी है । परम उत्कृष्ट सूर्य, चन्द्र आदि के आलोकस्वरूप सुधा लेप से तरुण की नाई विराज रहे आकाशरूप दीवारों से यह समन्वित है