Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 57, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अनन्यच्छेदभेदादि ब्रह्मणि ब्रह्मणाम्बरम् ।
किं कथं कस्य केनैव च्छिद्यते वा क्व भिद्यते ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए श्रह्मरूपता के अवलोकन से जगत् में छेदन, भेदन आदि सब व्यवहारों की अयोग्यता के
दर्शन से समस्त वासनाओं का समूल उच्छेद करना चाहिए, इस आशय से कहते हैं।
अर्जुन, जब ब्रह्म में प्रतिभासित छेदन, भेदन आदि सम्पूर्ण व्यवहार और उनका विषय जगत्-
ये सब ब्रह्म से अभिन्न होकर एकमात्र चिदाकाशस्वरूप ही हो गये, तब किस कर्ता या करण से किस
प्रकार से किस फल के लिए किस देश या किस काल में क्या छिन्न-भिन्न किया जा सकता है।
तात्पर्य यह है कि छेदन आदि व्यवहारवाद ब्रह्म से अतिरिक्त विषयों में देखे गये हैं, इसलिए जब
यह जगत् ब्रह्म से अभिन्न ही सिद्ध हो चुका है तब किसी कर्ता या करण से किसी प्रकार से किसी
फल के लिए किसी देश या काल में कुछ भी छिन्न या भिन्न नहीं हो सकता । अतः इन वासनाओं
को तुम समूल उखाड़कर फेंक दो