Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verses 9–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 57, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
सर्वज्ञोऽप्यतिबद्धात्मा पञ्जरस्थो यथा हरिः ।
यस्यास्ति वासनाबीजमत्यल्पं चितिभूमिगम् ॥ ९ ॥
बृहत्संजायते तस्य पुनः संसृतिकाननम् ।
अभ्यासाद्धृदि रूढेन सत्यसंबोधवह्निना ।
निर्दग्धं वासनाबीजं न भूयः परिरोहति ॥ १० ॥
दग्धं तु वासनाबीजं न निमज्जति वस्तुषु ।
सुखदुःखादिषु स्वच्छं पद्मपत्रमिवाम्भसि ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वासना को हृदय में अणुमात्र भी स्थान न देना चाहिए, क्योकि वह हजारों अनर्थो की बीज है, इस
आशय से कहते हैं।
जिसकी चित्तरूपी भूमि में अणुमात्र भी वासनारूप बीज पड़ा रहता है, उसका (अनेक अनर्थो से
भरा हुआ) संसाररूप जंगल पुनः बढ़ जाता है। अभ्यास से हृदय में रूढ, तत्त्वज्ञानस्वरूप अग्नि से
निःशेष जल गया वासनारूपी बीज पुन: अंकुर-जनन की सामर्थ्य नहीं रखता। निःशेष जले हुए वासना-
बीजों से युक्त तथा स्वच्छ मन जागतिक सुखदुःखादि वस्तुओं में वैसे ही नहीं डूबता, जैसे पानी में
कमल का पत्ता