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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 58, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 58, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

सर्वातीतं यदत्यच्छं विना शुद्धं स्ववासना । न शक्नोति पदं द्रष्टुं जनदृष्टिरणूनिव ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके दर्शन में श्रवण आदि से परिपुष्ट की गयी भलीभाँति अभ्यस्त निदिध्यासन नाम की उसकी भावना ही आवश्यक है, यह कहते है । पार्थ, अपनी वासना निदिध्यासननामक आत्मभावना के सिवा उस ब्रह्मपद को, जो सर्वातीत, चित्स्वभाव होने से अत्यन्त स्वच्छ ओर असंग होने के कारण शुद्ध हैं, वैसे नहीं देख सकती जैसे लोगों के नेत्र परमाणुओं को नहीं देख सकते