Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 1–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य राघवाऽघविनाशिनीम् ।
तिष्ठ निःसङ्गसंन्यासब्रह्मार्पणमयात्मकः ॥ १ ॥
यस्मिन्सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः ।
यश्च सर्वमयो नित्यमात्मानं विद्धि तं परम् ॥ २ ॥
दूरस्थमप्यदूरस्थं सर्वगं तत्स्थमेव च ।
तत्स्थः सत्तामवाप्नोषि तदेवास्यस्तसंशयः ॥ ३ ॥
यत्संवेद्यविनिर्मुक्तं संवेदनमनिर्मितम् ।
चेत्यमुक्तं चिदाभासं तद्विद्धि परमं पदम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, मेरे द्वारा कही जानेवाली सम्पूर्णं पापों की विनाशक दृष्टि
का अवलम्बनकर आप निःसंगतारूप त्वंपदार्थशोधभूत सर्वत्याग ओर सम्पूर्णं जगत् का ब्रह्म मे बाधरूप
तत्पदार्थशोधभूत ब्रह्मार्पण इन दोनों के अनन्तर परिशिष्ट अखण्ड महावाक्य के तात्पर्यविषयभूत
सच्चिदानन्देकस्वरूप भूमात्मारूप होकर स्थित रहिए । श्रीरामजी, सृष्टिकाल में जिससे यह सम्पूर्ण
जगत् उत्पन्न होता है, स्थिति-काल में जिसमें सम्पूर्णं जगत् अवस्थित रहता हे, संहारकालमे जो
सम्पूर्ण जगत्स्वरूप हो जाता है, जो तीनों काल में चारों ओर विद्यमान है ओर इस रीति से अनित्य
प्रपंचात्मक होता हुआ भी जो सनातन निरतिशय ब्रह्मरूप है, उसीको आप “आत्मा जानिए, न कि
परिच्छिन्न स्वभाववाले को । श्रीरामभद्र समस्त प्रपंचो से बहिर्भूत होने के कारण वह आत्मा दूरस्थ
होता हुआ भी सर्वान्तर्यामी होने से अदूरस्थ ही है, इसी तरह आकाश की नाई सर्वव्यापी होने पर भी,
जातिरूप धर्म के समान, वह तत्तत् वस्तुओं में ही रहता है । (यों सभी युक्तियों से वही एक वस्तु है
दूसरी नहीं ऐसा सिद्ध हो जाने पर) जब परिच्छन्नरूप से भी उसमें स्थित हुए आप एकमात्र उसीकी
सत्ता से अपनी सत्ता प्राप्त करते हैं, स्वतन्त्ररूप से नहीं, तब आपको परिच्छेदाभिमान से फल ही क्या
मिला ? वास्तव में अपरिच्छिन्न सन्मात्रस्वरूप ही आप हैं, अतः परिच्छेद के संशय से रहित हो जाइए ।
विवेकी पुरुषों द्वारा चिदात्मा के अनुभूयमान दो रूप हैं एक तो चित्त ओर उसकी वृत्ति में प्रतिबिम्बित
विषयार्थ प्रकाशन, जो कि चित्तनिर्मित है ओर दूसरा चित्त, उसकी वृत्ति ओर उसके विषयों के आगम,
अपाय आदि सभी अवस्थाओं के साक्षिभूत संविद्रूप, जो कि नित्यसिद्ध हे । वे दोनों यदि विषय और
संवेद्य (त्रिपुटी) से विनिर्मुक्त हो जाय तो परमपद ब्रह्मरूप ही हो जाते हैं, यह आप जानिये
सर्ग सन्दर्भ
अद्जवनवाँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग जिस दृष्टि से जीवन्मुक्त-पद में चिति की स्पन्दरहित, विषयों से निर्मुक्त ओर निश्चल स्थिति होती है, उसका वर्णन ।