Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 14–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verses 14–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माकाशमनाद्यन्तं केवेयत्ता ममात्मनः ।
इति निश्चयवानन्तः सम्यग्व्यवहृतिर्बहिः ॥ १४ ॥
उदयास्तमयोन्मुक्तस्थितिरन्तः स सर्वदा ।
नास्तमेति न चोदेति मनः समसमस्थितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार के विचारवान् पुरुष की वह स्थिति लोक-शास्त्र से अविरुद्ध व्यवहार काल में भी दूर
नहीं होती, इस आशय से कहते हैं।
श्रीरामजी, जो पुरुष "ब्रह्मस्वरूप मुझमें इयत्ता कैसी इस प्रकार के अपने भीतर निश्चय से युक्त
रहता है, बाहर से लोकशास्त्र के अविरुद्ध व्यवहारो से युक्त होने पर भी उसकी उस प्रकार की स्थिति
सर्वदा भीतर उदय एवं अस्त से विनिर्मुक्त ही रहती हे । जिसका मन समसे भी सम ब्रह्म मेँ लीन होकर
न उदित ओर न अस्त होता है एवं जिसकी दृष्टि में मन की आकाश के सदुश शून्यरूपता ही हे वह
महात्मा ही यहाँ ब्रह्मरूप हे